सिंध का महासमर: अंतिम हिंदू सम्राट, रक्त रंजित अरोड़ और बलिदान की अमर गाथा
सिंध का महासमर: अंतिम हिंदू सम्राट, रक्त रंजित अरोड़ और बलिदान की अमर गाथा
(एक ऐतिहासिक दस्तावेज)
प्रस्तावना: 7वीं शताब्दी का सिंध - 'सोने की चिड़िया'
7वीं शताब्दी में सिंध केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, बल्कि वह भारतवर्ष का 'सिंह द्वार' था। इसका विस्तार पश्चिम में मकरान (वर्तमान बलूचिस्तान) से लेकर पूर्व में कश्मीर और कन्नौज की सीमाओं तक, और दक्षिण में अरब सागर से उत्तर में मुल्तान तक था। यह भूमि व्यापार, संस्कृति और सनातन धर्म का केंद्र थी। यहाँ की राजधानी 'अरोड़' (Aror) थी, जो सिंधु नदी के तट पर स्थित एक अभेद्य दुर्ग और समृद्ध नगर था।
अध्याय 1: चच राजवंश और महाराजा दाहिर सेन का उदय
1.1 राजवंश की पृष्ठभूमि
सिंध पर 'चच राजवंश' का शासन था। इस वंश की स्थापना महाराजा दाहिर के पिता चच ने की थी। 695 ईस्वी (लगभग) में महाराजा दाहिर सेन गद्दी पर बैठे। वे एक विद्वान, कूटनीतिज्ञ और अत्यंत स्वाभिमानी ब्राह्मण शासक थे।
1.2 अरबों की गिद्ध दृष्टि और 14 असफल आक्रमण
इतिहास की मुख्यधारा की पुस्तकों में अक्सर 712 ई. के युद्ध का वर्णन मिलता है, लेकिन सत्य यह है कि सिंध ने अरब आक्रमणकारियों को इससे पहले 14 बार धूल चटाई थी।
खलीफा उमर और उस्मान का काल: अरबों ने सबसे पहले 'देवल' (कराची के निकट) पर नौसैनिक हमले किए, जिन्हें सिंध की नौसेना ने विफल कर दिया।
उबैदुल्लाह और बुदैल का वध: खलीफा ने अपने क्रूर सेनापतियों उबैदुल्लाह और बुदैल को भेजा। महाराजा दाहिर के पुत्र जयसिंह और उनके सामंतों ने इन दोनों सेनापतियों को युद्धभूमि में मार गिराया।
दाहिर की महानता और भूल: हर जीत के बाद, राजा दाहिर ने भारतीय युद्ध नीति (धर्मयुद्ध) का पालन करते हुए भागती हुई अरब सेना का पीछा नहीं किया और पकड़े गए सैनिकों को क्षमादान देकर छोड़ दिया। यही सैनिक बाद में सिंध के भूगोल और कमजोरियों की जानकारी लेकर वापस आए।
अध्याय 2: संघर्ष का कारण और मोहम्मद बिन कासिम का आगमन
2.1 समुद्री डकैती का बहाना
इराक के गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने सिंध पर आक्रमण के लिए एक तात्कालिक कारण गढ़ा। श्रीलंका से अरब खलीफा के लिए उपहार लेकर जा रहे कुछ जहाजों को देवल बंदरगाह के पास समुद्री लुटेरों ने लूट लिया। हज्जाज ने राजा दाहिर से हर्जाना माँगा। राजा दाहिर ने स्पष्ट कहा— "समुद्री लुटेरों पर मेरा नियंत्रण नहीं है, वे सागर के नियम मानते हैं।"
2.2 मृत्यु का दूत: मोहम्मद बिन कासिम
इस इनकार को अपमान मानकर हज्जाज ने अपने 17 वर्षीय भतीजे और दामाद मोहम्मद बिन कासिम को 711 ई. में एक विशाल सेना, 6000 सीरियन घोड़े, और 'मंजनीक' (पत्थर फेंकने वाली विशाल मशीनें, जिसे 'उरूस' कहा जाता था) के साथ भेजा।
अध्याय 3: आंतरिक विश्वासघात - सिंध के पतन की नींव
सिंध तलवार के बल पर नहीं, बल्कि 'अपनों' की गद्दारी से हारा।
3.1 निरूण कोट और बौद्ध भिक्षु
जब कासिम सिंध पहुँचा, तो निरूण कोट (वर्तमान हैदराबाद) के बौद्ध शासकों और भिक्षुओं ने बिना लड़े ही द्वार खोल दिए। उनका तर्क था कि "हम अहिंसक हैं," लेकिन वास्तविकता में उन्होंने शत्रु की सहायता की। उन्होंने कासिम को रसद (राशन) और मार्गदर्शक दिए।
3.2 मोक्षवासव (Mokshavasav) का षड्यंत्र
इतिहास में मोक्षवासव नामक एक व्यक्ति (संभवतः मंत्री या एक प्रभावशाली तांत्रिक) का उल्लेख आता है। उसने कासिम को अरोड़ जीतने का गुप्त मंत्र बताया। उसने कहा:
"जब तक अरोड़ के मंदिर पर लहरा रहा 'ध्वज' और राजा दाहिर की भुजा पर बंधा 'रक्षक ताबीज' सुरक्षित है, तब तक देवता उनकी रक्षा करेंगे और सेना का मनोबल नहीं टूटेगा।"
अध्याय 4: अरोड़ का निर्णायक युद्ध (20 जून, 712 ईस्वी)
यह युद्ध मानवता और बर्बरता के बीच था। कासिम अपनी सेना लेकर अरोड़ के सामने आ डटा।
4.1 गायों और मूर्तियों का ढाल के रूप में प्रयोग
जब कासिम ने देखा कि सीधी टक्कर में राजा दाहिर के हाथी और राजपूत योद्धा भारी पड़ रहे हैं, तो उसने छल का सहारा लिया।
उसने अपनी सेना की अग्रिम पंक्ति में गायों को बांध दिया।
अरब सैनिकों के हाथों में भगवान शिव और अन्य हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ थमा दी गईं।
प्रभाव: राजा दाहिर की सेना ठिठक गई। वे गोवंश और अपने ईश्वर पर तीर नहीं चला सकते थे। इसी संकोच का लाभ उठाकर अरब तीरंदाजों ने आग के गोले बरसाने शुरू कर दिए।
4.2 सेनापति मनु देव गुर्जर का शौर्य
इस युद्ध में मनु देव गुर्जर (तत्कालीन सेना के प्रमुख सेनापतियों में से एक) ने अद्भुत पराक्रम दिखाया।
मनु देव ने अरोड़ की रक्षा पंक्ति को संभाला और अरबों की घुड़सवार सेना (Cavalry) को कई बार पीछे धकेला।
जब राजा दाहिर हाथी पर सवार होकर युद्ध कर रहे थे, मनु देव उनकी रक्षा में चट्टान की तरह डटे रहे। स्थानीय लोकगाथाओं के अनुसार, मनु देव ने अंतिम सांस तक अरोड़ के मुख्य द्वार की रक्षा की।
4.3 राजा दाहिर की वीरगति
एक अरब तीरंदाज ने नेफ्था (ज्वलनशील पदार्थ) से बुझा तीर राजा दाहिर के हाथी के हौदे पर मारा। हाथी आग से घबराकर सिंधु नदी की ओर भागा। राजा दाहिर जमीन पर गिर पड़े।
गिरने के बाद भी उन्होंने घोड़े पर सवार होकर युद्ध जारी रखा।
अंततः, शत्रुओं से घिरे होने पर वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के साथ ही सिंध की स्वतंत्रता का सूर्य अस्त हो गया।
अध्याय 5: रानियों का जौहर और रावर का प्रतिरोध
5.1 रानी बाई का नेतृत्व
राजा की मृत्यु के बाद, उनकी विधवा रानी बाई ने रावर (Rawar) के किले से कमान संभाली। उन्होंने 15,000 सैनिकों के साथ अरबों को चुनौती दी। उन्होंने कहा— "गायों की तरह जीने से बेहतर है शेरनी की तरह मरना।"
5.2 ऐतिहासिक जौहर
जब रसद खत्म हो गई और हार निश्चित हो गई, तो रानी बाई ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए हजारों महिलाओं के साथ अग्नि में प्रवेश किया। यह भारत के इतिहास का पहला बड़ा दर्ज जौहर था।
अध्याय 6: मुल्तान का पतन - 'सोने का नगर'
अरोड़ के बाद कासिम मुल्तान पहुँचा।
प्रतिरोध: यहाँ भी हिंदुओं ने कड़ा मुकाबला किया।
विश्वासघात: एक देशद्रोही ने कासिम को उस गुप्त नहर के बारे में बता दिया जिससे किले को पानी मिलता था। कासिम ने पानी रोक दिया और स्रोत में जहर/सड़ी हुई चीजें मिला दीं। प्यास से तड़पकर सैनिकों को समर्पण करना पड़ा।
लूट: यहाँ से कासिम को इतना सोना मिला कि उसने मुल्तान का नाम 'फर्ज़-ए-बैत-उल-माल' रखा। सूर्य मंदिर की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को मांस तौलने के लिए दे दिया गया।
अध्याय 7: प्रतिशोध - सूर्या देवी और परिमल देवी (715 ईस्वी)
यह इतिहास का सबसे मर्मस्पर्शी अध्याय है। कासिम ने राजा दाहिर की दो युवा पुत्रियों, सूर्या देवी और परिमल देवी, को बंदी बनाकर खलीफा वालिद बिन अब्दुल मलिक के पास दमिश्क (Damascus) भेजा।
7.1 कूटनीतिक जाल
जब वे खलीफा के सामने पेश हुईं, तो उन्होंने अत्यंत साहस और चतुरता का परिचय दिया। उन्होंने खलीफा से कहा:
"हम आपकी सेवा के योग्य नहीं हैं। आपके सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने हमें आपके पास भेजने से पहले ही हमारी अस्मिता लूट ली है। उसने आपका अपमान किया है।"
7.2 कासिम का अंत (बैल की खाल)
क्रोध से पागल खलीफा ने तुरंत फरमान लिखा कि कासिम को, वह जहाँ भी हो, कच्ची बैल की खाल (Ox-hide) में सिलकर दमिश्क भेजा जाए।
कासिम ने आदेश का पालन किया। खाल में सिलने और दम घुटने से रास्ते में ही उसकी दर्दनाक मौत हो गई।
7.3 सत्य का उद्घाटन और आत्म-बलिदान
जब कासिम की लाश खलीफा के सामने खोली गई, तो दोनों राजकुमारियों ने अपना सत्य उजागर किया:
"मोहम्मद बिन कासिम ने हमें हाथ भी नहीं लगाया था। उसने हमारे पिता को मारा, हमारी माँ को जौहर करने पर विवश किया और हमारी मातृभूमि को रौंदा। हमने एक झूठ बोलकर अपने देश के सबसे बड़े शत्रु को बिना हथियार उठाए मार डाला। हमारा प्रतिशोध पूरा हुआ।"
7.4 मृत्यु
इसके बाद की घटना विवरण मिलते हैं:
खलीफा द्वारा मृत्युदंड दिए जाने से पहले ही दोनों बहनों ने अपनी छिपायी हुई कटार/छुरी (Knife) निकाली और एक-दूसरे के प्राण लेकर अपना बलिदान दे दिया, ताकि कोई शत्रु उन्हें छू न सके।अध्याय 8: 7वीं शताब्दी के सिंध का वर्तमान विभाजन
महाराजा दाहिर का वह विशाल साम्राज्य आज कई टुकड़ों में बंटा हुआ है। 7वीं सदी के सिंध के विभिन्न हिस्से आज आधुनिक मानचित्र पर कहाँ हैं?
अरोड़ (राजधानी): यह आज पाकिस्तान के सिंध प्रांत के रोहरी (Rohri) और सक्खर (Sukkur) के पास एक खंडहर है। सिंधु नदी ने अपनी धारा बदल ली, जिससे यह शहर वीरान हो गया।
देवल (बंदरगाह): यह आज के कराची और भंभोर (Bhambhore) के आसपास का क्षेत्र है।
मुल्तान: यह आज पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का एक प्रमुख शहर है। (उस समय यह सिंध का उत्तरी भाग था)।
मकरान: यह आज बलूचिस्तान (पाकिस्तान) और ईरान के सीमावर्ती क्षेत्रों में है।
कच्छ और काठियावाड़: राजा दाहिर के राज्य का कुछ दक्षिणी हिस्सा आज भारत के गुजरात राज्य (कच्छ) में आता है।
पश्चिमी राजस्थान: जैसलमेर और बाड़मेर के कुछ हिस्से उस समय सिंध के प्रभाव क्षेत्र में थे।
अध्याय 9: निष्कर्ष और ऐतिहासिक प्रभाव
राजा दाहिर सेन और मनु देव गुर्जर जैसे वीरों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया।
गुर्जर-प्रतिहार दीवार: सिंध के पतन से सबक लेकर नागभट्ट प्रथम और बप्पा रावल ने भारत की सीमाओं को इतना मजबूत कर दिया कि अरब आक्रमणकारी अगले 300 वर्षों तक सिंध से आगे भारत के मुख्य भूभाग में प्रवेश नहीं कर सके।
ज्ञान का प्रवाह: अरबों ने सिंध से ही 'शून्य' (Zero), दशमलव प्रणाली, शतरंज और आयुर्वेद सीखा, जिसे उन्होंने बाद में यूरोप तक पहुँचाया।
संदर्भ ग्रंथ (Reference Books):
चचनामा (Chachnama) - अली कुफी (मूल अरबी से फारसी अनुवाद)।
तारीख-ए-सिंध (Tarikh-i-Sindh) - मीर मासूम।
History of Sind - H.T. Lambrick.
The Sindhi Hindus - N.L. Gupta.
लेखक का नोट: यह लेख उन वीरों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने धर्म और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। राजा दाहिर आज भी सिंधियत और प्रतिरोध के प्रतीक हैं।
