सनातन का विस्मृत सत्य: औपनिवेशिक षड्यंत्र और मूल संस्कृति का विखंडन
सनातन का विस्मृत सत्य: औपनिवेशिक षड्यंत्र और मूल संस्कृति का विखंडन
(एक विस्तृत ऐतिहासिक और शास्त्र सम्मत विवेचना)
प्रस्तावना
भारतवर्ष, जो कभी विश्वगुरु के पद पर आसीन था, आज अपनी ही पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। वर्तमान समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियाँ, जिन्हें सनातन धर्म का अभिन्न अंग मान लिया गया है, वास्तव में इस धर्म का मूल स्वरूप कभी थीं ही नहीं। यह एक ऐतिहासिक त्रासदी है कि जिस संस्कृति ने विश्व को "वसुधैव कुटुम्बकम" का मंत्र दिया, उसे आज जातिवाद और भेदभाव का जनक माना जाता है। इस भ्रांति का मूल कारण वह औपनिवेशिक कालखंड है, जिसने न केवल भारत की सीमाओं पर अधिकार किया, बल्कि भारतीय जनमानस की चेतना (Consciousness) को भी गुलाम बना लिया। यह आलेख उन 7 प्रमुख बिंदुओं और ऐतिहासिक तथ्यों का विस्तार से विश्लेषण करेगा जो सिद्ध करते हैं कि वर्तमान सामाजिक ढांचा सनातन नहीं, बल्कि विदेशी षड्यंत्र और अज्ञानता की उपज है।
खंड १: 1835 का षड्यंत्र और भारतीय शिक्षा का विनाश
(The Great Disconnect: Macaulay’s Minute of 1835)
भारतीय इतिहास का सबसे काला अध्याय किसी युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि कागज के पन्नों पर लिखा गया। वह तारीख थी 2 फरवरी 1835, जब लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले (Lord Thomas Babington Macaulay) ने अपना कुख्यात "मिनट ऑन इंडियन एजुकेशन" (Minute on Indian Education) ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत किया।
मैकाले का स्पष्ट मत था कि एक पुरानी और समृद्ध सभ्यता को गुलाम बनाने के लिए उसकी रीढ़ की हड्डी को तोड़ना आवश्यक है, और वह रीढ़ थी—उसकी शिक्षा व्यवस्था और संस्कृत भाषा। मैकाले ने तर्क दिया कि "एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का एक तख्ता भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य के बराबर है।" यह केवल अहंकार नहीं था, यह एक सोची-समझी रणनीति थी।
7 मार्च 1835 को तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक (William Bentinck) ने इस प्रस्ताव को आधिकारिक मंजूरी दी। इसके साथ ही 'इंग्लिश एजुकेशन एक्ट 1835' पारित हुआ। इसका उद्देश्य केवल अंग्रेजी सिखाना नहीं था, बल्कि भारतीयों को अपनी ही जड़ों से काट देना था। मैकाले ने अपने पिता को लिखे पत्र में कहा था: "हमारा उद्देश्य ऐसे लोगों का एक वर्ग तैयार करना है जो रक्त और रंग में भारतीय हों, लेकिन अपनी रुचि, विचार, नैतिकता और बुद्धिमत्ता में अंग्रेज हों।"
दुष्प्रभाव: इस नीति ने भारत को ज्ञान और संस्कृत से तोड़ दिया। गुरुकुल व्यवस्था, जो चरित्र निर्माण और कौशल विकास पर आधारित थी, उसे अवैध और पिछड़ा घोषित कर दिया गया। इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि 1879 में ईरोड (जहाँ ई.वी. रामासामी 'पेरियार' का जन्म हुआ) और 1891 में महू (जहाँ डॉ. बी.आर. अंबेडकर का जन्म हुआ) में जन्मे व्यक्तित्व, यद्यपि मेधावी थे, किन्तु उनकी शिक्षा-दीक्षा इसी मैकाले द्वारा रचित प्रणाली के अंतर्गत हुई। चूँकि संस्कृत और मूल शास्त्रों का ज्ञान जनमानस से लुप्त कर दिया गया था, इसलिए इन महानुभावों ने जिस "हिंदू धर्म" को देखा, वह वह नहीं था जो वेदों में वर्णित था, बल्कि वह था जो ब्रिटिश चश्मे और तत्कालीन समाज की विकृतियों से भरा था। परिणामतः, वे भारत की मूल संस्कृति के ही खिलाफ खड़े हो गए, क्योंकि उन्हें 'रोग' तो दिखा, पर उसका असली 'कारण' (औपनिवेशिक षड्यंत्र) नहीं बताया गया।
खंड २: महिला सशक्तिकरण और वैदिक सत्य
(Women Empowerment: Myth vs. Reality)
आज के तथाकथित आधुनिक समाज में महिला सशक्तिकरण का ढोल पीटने वाले लोग शायद यह नहीं जानते कि जब पश्चिमी दुनिया में महिलाओं को "आत्मा है या नहीं" इस पर बहस हो रही थी, तब भारत में महिलाएं वेद की ऋचाएं लिख रही थीं।
सनातन धर्म में स्त्री को केवल भोग की वस्तु नहीं, बल्कि 'शक्ति' और ज्ञान का स्रोत माना गया है। वैदिक काल में शिक्षा पर महिलाओं का समान अधिकार था।
शास्त्र प्रमाण: ऋग्वेद और अन्य संहिताओं में लगभग 27 विदुषी महिलाओं (ऋषिकाओं) का उल्लेख मिलता है जिन्होंने मंत्रों का दर्शन किया।
घोषा, लोपामुद्रा, मैत्रेयी और गार्गी जैसी विदुषियाँ इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद (3.6 और 3.8) में गार्गी और याज्ञवल्क्य के बीच का शास्त्रार्थ विश्व प्रसिद्ध है, जहाँ एक महिला भरी सभा में ब्रह्मज्ञानी ऋषि को प्रश्न पूछकर निरुत्तर करती है।
अथर्ववेद (11.5.18) में स्पष्ट कहा गया है:
"ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्" (अर्थात: कन्या ब्रह्मचर्य (वैदिक शिक्षा) पूर्ण करने के पश्चात ही युवा पति को प्राप्त करे।)
यह श्लोक सिद्ध करता है कि बाल विवाह की कुप्रथा वैदिक नहीं थी और कन्याओं को शिक्षा का पूर्ण अधिकार था। जो लोग आज शिक्षा का श्रेय अंग्रेजों को देते हैं, वे वास्तव में अपने गौरवशाली अतीत से अनभिज्ञ हैं।
खंड ३: वर्ण व्यवस्था बनाम जातिवाद (1901 का छल)
(Varna vs. Caste: The Census of 1901)
आज जिस जातिवाद के खिलाफ लड़ाइयाँ लड़ी जा रही हैं, वह वास्तव में सनातन धर्म का हिस्सा ही नहीं था। 'जाति' (Caste) शब्द पुर्तगाली शब्द 'Casta' से आया है, जिसका अर्थ है नस्ल या भेद। भारतीय शब्द 'वर्ण' था, जिसका अर्थ है 'चयन करना' या 'रंग' (गुणों का)।
अंग्रेजों ने भारत पर राज करने के लिए "बांटो और राज करो" की नीति अपनाई। इसकी पराकाष्ठा 1901 में हुई, जब लॉर्ड हर्बर्ट होप रिस्ले (Herbert Hope Risley) ने जनगणना (Census) के माध्यम से भारत की सामाजिक संरचना को हमेशा के लिए विकृत कर दिया। रिस्ले ने वर्णों के अंतर्गत आने वाले विभिन्न समूहों (गिल्ड्स/श्रेणियों) को कठोर "जाति" (Caste) का रूप दे दिया और इसे जन्म आधारित पदानुक्रम (Hierarchy) में जड़ दिया।
मैकाले द्वारा संस्कृत को पहले ही खत्म कर दिए जाने के कारण, आम भारतीय यह सत्यापित करने में असमर्थ था कि उसके धर्मग्रंथ क्या कहते हैं। गलत अनुवादों के माध्यम से यह प्रचारित किया गया कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जन्म से होते हैं और शूद्र 'नीच' हैं। जबकि भगवद्गीता में भगवान कृष्ण स्पष्ट कहते हैं:
श्रीमद्भगवद्गीता (4.13):
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।। (अर्थात: चारों वर्णों की रचना मैंने गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की है, न कि जन्म के आधार पर।)
अंग्रेजों ने 'गुण-कर्म' को हटाकर 'जन्म' को आधार बनाया ताकि समाज बंटे और उनका शासन चलता रहे।
खंड ४: सुधारकों का भ्रम और औपनिवेशिक चश्मा
(The Misguided Reformers)
19वीं और 20वीं सदी में जिन्हें हम "समाज सुधारक" मानते हैं, उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु उनके दृष्टिकोण की सीमा को समझना आवश्यक है। वे उसी शिक्षा प्रणाली की उपज थे जिसे मैकाले ने डिजाइन किया था।
तत्कालीन समाज में भेदभाव था, यह सत्य है। लेकिन यह भेदभाव सनातन का मूल नहीं, बल्कि मुगलों के आक्रमण और अंग्रेजों की नीतियों के कारण उत्पन्न विकृति थी। इन सुधारकों ने "रोग" (भेदभाव) का इलाज करने के बजाय, "शरीर" (मूल सनातन धर्म) को ही काटना शुरू कर दिया। उन्होंने वेदों और उपनिषदों के मूल तत्व को जानने की चेष्टा किए बिना, अंग्रेजी अनुवादों और औपनिवेशिक व्याख्याओं को सत्य मान लिया।
परिणामस्वरूप, जो लड़ाई "कुप्रथाओं" के खिलाफ होनी चाहिए थी, वह दुर्भाग्यवश "धर्म और संस्कृति" के खिलाफ लड़ाई में बदल गई। उन्होंने यह नहीं समझा कि जिस 'मनुवाद' को वे कोस रहे हैं, उसी मनु ने गुणों के आधार पर वर्ण परिवर्तन का विधान दिया था।
खंड ५: वर्ण परिवर्तन के शास्त्रीय प्रमाण (साक्ष्य)
(Scriptural Evidence of Fluid Varna System)
सनातन धर्म में वर्ण व्यवस्था कितनी लचीली (Fluid) थी, इसके प्रमाण पुराणों और इतिहास ग्रंथों में भरे पड़े हैं। आपके द्वारा इंगित किए गए तथ्य शत-प्रतिशत सत्य हैं:
जमदग्नि और परशुराम: महाऋषि जमदग्नि जन्म से ब्राह्मण थे, किन्तु उनके पुत्र भगवान परशुराम ने क्षत्रिय धर्म (युद्ध और शस्त्र) को अपनाया। वे ब्राह्मण होकर भी क्षत्रिय कर्म के लिए पूजे गए।
रावण और विभीषण: ऋषि विश्रवा (पुलस्त्य ऋषि के पुत्र) ब्राह्मण थे। उनका पुत्र रावण, वेदों का ज्ञानी होने के बावजूद, अपने क्रूर कर्मों के कारण 'राक्षस' कहलाया। वहीं, उसी का भाई विभीषण अपने सात्विक गुणों और धर्म के पक्षधर होने के कारण 'ब्राह्मण' तुल्य माना गया। यह सिद्ध करता है कि पिता एक होने पर भी गुण और कर्म से वर्ण बदल गया।
खंड ६: वंशावली और वर्ण परिवर्तन (श्रीमद्भागवत पुराण)
(Specific References from Bhagavatam)
पुराणों में पूरे वंशों के वर्ण बदलने के प्रमाण मिलते हैं, जो आज की जाति व्यवस्था के मुंह पर तमाचा हैं।
राजा नाभाग और दिष्ट: राजा नाभाग के पुत्र 'दिष्ट' के वंशज वैश्य बने। और उन्हीं के कुल में आगे चलकर पुनः कुछ लोग ब्राह्मण बने। (विष्णु पुराण और भागवत पुराण में इसके संदर्भ मिलते हैं)।
पृषध की कथा: श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कंध में ऋषि मनु के पुत्रों का वर्णन है। श्रीमद्भागवत पुराण (9.2.9):
पृषधस्तु मनोः पुत्रो गोपालो गुरुणा कृतः। पालयन गां वनं रात्रौ प्राविशद् दुःसहं तमः।। (संदर्भ: मनु के पुत्र पृषध क्षत्रिय थे। उन्हें गायों की रक्षा का भार सौंपा गया था। अनजाने में उनसे एक गाय की हत्या हो गई (अंधेरे में बाघ समझकर)। इस कर्म के कारण उनके गुरु ने उन्हें शूद्र होने का श्राप दिया। पृषध ने क्षत्रिय धर्म छोड़कर शूद्र धर्म स्वीकार किया और तपस्या के माध्यम से मोक्ष प्राप्त किया।)
अमरीष और इक्ष्वाकु वंश: राजा इक्ष्वाकु के वंशज अमरीष (और उनके भाई-बंधु) के कुल में हारित हुए, जिनसे 'हारित' गोत्र के ब्राह्मण उत्पन्न हुए। क्षत्रिय पिता की संताने ब्राह्मण कैसे हुईं? क्योंकि वर्ण गुणों पर आधारित था।
श्रीमद्भागवत पुराण (9.2.23):
ज्ञातिभाद् ब्राह्मणो भूतः... (अर्थात: केवल नाभाग ही नहीं, अन्य क्षत्रिय राजाओं के वंशज भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।)
खंड ७: विवाह, सती प्रथा और गोत्र का ऐतिहासिक सत्य
(Marriage, Sati, and the Invasion Theory)
सती प्रथा का मिथक: वेद, उपनिषद या रामायण-महाभारत के मूल पाठ में कहीं भी "सती प्रथा" (पति की मृत्यु पर पत्नी को अनिवार्य रूप से जलाने) का विधान नहीं है। रामायण में, दशरथ की मृत्यु के बाद कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी सती नहीं हुईं। महाभारत में उत्तरा, कुंती और सत्यवती विधवा होकर भी सम्मानपूर्वक जीवित रहीं और राजकाज में योगदान दिया।
जौहर और रानी बाई: इतिहास गवाह है कि भारत में स्त्रियों के सामूहिक आत्मदाह (जौहर) की घटनाएं 8वीं शताब्दी के बाद शुरू हुईं, जब अरबी और तुर्की आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए। सिंध के राजा दाहिर की मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी रानी बाई ने किले की रक्षा की। जब रसद खत्म हो गई और यह स्पष्ट हो गया कि म्लेच्छ (अरबी आक्रांता) किले में प्रवेश करेंगे, तो यह ज्ञात था कि वे न केवल जीवित महिलाओं के साथ बल्कि "मुर्दा लाशों के साथ भी बर्बरता" (Necrophilia जैसी विकृतियाँ) करते थे। अपने शरीर की पवित्रता और सम्मान को बचाने के लिए, रानी बाई और अन्य महिलाओं ने अग्नि में प्रवेश किया। यह 'प्रथा' नहीं, बल्कि 'आपात्कालीन बलिदान' था। अंग्रेजों ने इस बलिदान को "बर्बर हिंदू प्रथा" बताकर प्रचारित किया।
विवाह और गोत्र व्यवस्था: प्राचीन भारत में स्वयंवर की प्रथा थी। सीता, द्रौपदी, दमयंती—सबने अपना पति स्वयं चुना। कोई जाति बंधन नहीं था। शांतनु (क्षत्रिय) ने सत्यवती (निषाद/मछुआरा कन्या) से विवाह किया।
कठोरता क्यों आई? जब विदेशी आक्रांता (अरब, तुर्क, मुगल) आए, तो वे भारतीय महिलाओं का अपहरण कर उन्हें हरम में ले जाते थे। समाज में भय व्याप्त हो गया।
बाल विवाह: बेटियों को आक्रांताओं की नजर से बचाने के लिए कम उम्र में विवाह की मजबूरी शुरू हुई।
गोत्र और कुल: अपनी पहचान सुरक्षित रखने के लिए लोगों ने अपने नाम के आगे गोत्र (ऋषि कुल) और स्थान (गाँव/खेड़ा) का नाम लगाना शुरू किया।
सजातीय विवाह: अजनबियों पर भरोसा करना असंभव हो गया था, इसलिए "जान-पहचान" (रिश्तेदारी या समान समूह) में विवाह करने की प्रथा शुरू हुई ताकि बेटी सुरक्षित रहे। जिसे आज हम "कट्टर जातिवाद" कहते हैं, वह वास्तव में उस कालखंड की एक "रक्षात्मक रणनीति" (Defense Mechanism) थी।
उपसंहार: एकता का वैदिक मंत्र
उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जिसे आज हम "सामाजिक बुराइयां" मानते हैं, वे या तो विदेशी आक्रांताओं के भय से उपजी तत्कालीन व्यवस्थाएं थीं, या फिर अंग्रेजों द्वारा सुनियोजित ढंग से फैलाया गया भ्रम जाल। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति और रिस्ले की जनगणना ने हमें हमारी जड़ों से काटा। आज आवश्यकता है कि हम अंग्रेजी चश्मे को उतारें और संस्कृत के मूल ग्रंथों की ओर लौटें।
वेद भेद नहीं, अभेद सिखाते हैं। ऋग्वेद का अंतिम सूक्त (संज्ञान सूक्त) ही संगठन और एकता का मूल मंत्र है, जो आज के जातिवाद को पूरी तरह नकारता है:
ऋग्वेद (10.191.4):
समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:। समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।।
भावार्थ: "तुम्हारे संकल्प एक समान हों, तुम्हारे हृदय एक समान (प्रेम से भरे) हों। तुम्हारे मन एक होकर विचार करें, जिससे तुम सब उत्तम संगठन के साथ (सुखपूर्वक) रह सको।"
यही सनातन का सत्य है। वर्ण व्यवस्था सहयोग के लिए थी, संघर्ष के लिए नहीं।
"यह सत्य किसी को चुभ सकता है, किन्तु यही कड़वा सत्य है।" हमें अपनी कुरीतियों को सुधारना है, लेकिन आत्मग्लानि (Self-loathing) में नहीं जीना है, क्योंकि हमारा मूल शुद्ध और वैज्ञानिक था।